Online Course का सबसे बड़ा झूठ: स्किल ट्रेनिंग के नाम पर बिक रहा सपना – डिजिटल इंडिया के दौर में ऑनलाइन पढ़ाई एक क्रांति के रूप में सामने आई थी। दावा किया गया कि अब शिक्षा सस्ती होगी, हर घर तक पहुँचेगी और युवाओं को नई स्किल्स के जरिए रोज़गार मिलेगा। लेकिन कुछ ही वर्षों में यह उम्मीद एक बड़े बाज़ार में बदल गई, जहाँ ज्ञान से ज़्यादा विज्ञापन, दावे और भ्रम बिकने लगे।
- आज भारत में हज़ारों ऑनलाइन कोर्स प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। हर दूसरा विज्ञापन कहता है—
- “तीन महीने में जॉब”,
- “50,000 सैलरी की गारंटी”,
- “डिग्री की जरूरत नहीं”।
यही वाक्य ऑनलाइन कोर्स का सबसे बड़ा झूठ बन चुके हैं।
जॉब गारंटी का भ्रम
सबसे आकर्षक और सबसे भ्रामक दावा होता है—जॉब गारंटी।
असलियत यह है कि:
- अधिकतर प्लेटफॉर्म सिर्फ इंटरव्यू का मौका दिलाते हैं, नौकरी नहीं
- “Placement Assistance” को जानबूझकर “Placement” के रूप में प्रचारित किया जाता है
- अगर छात्र को नौकरी न मिले तो जिम्मेदारी उसकी मेहनत पर डाल दी जाती है
कानूनी तौर पर यह दावा धुंधला होता है, लेकिन नैतिक रूप से यह सीधा धोखा है।
सर्टिफिकेट बनाम असली स्किल
ऑनलाइन कोर्स पूरा करने पर मिलने वाला सर्टिफिकेट अक्सर सजावटी कागज़ से ज़्यादा कुछ नहीं होता।
- न तो कंपनियां इन्हें मान्यता देती हैं
- न ही यह किसी सरकारी या इंडस्ट्री बॉडी से प्रमाणित होते हैं
कई छात्र सिर्फ सर्टिफिकेट के भरोसे इंटरव्यू में जाते हैं, लेकिन जब वास्तविक स्किल टेस्ट होता है, तो सच्चाई सामने आ जाती है।
रिकॉर्डेड लेक्चर, लेकिन लाइव कीमत
अधिकतर महंगे ऑनलाइन कोर्स में:
- पुराने रिकॉर्डेड वीडियो
- सीमित या नाममात्र का मेंटर सपोर्ट
- सवाल पूछने पर ऑटोमेटेड जवाब
इसके बावजूद फीस 30,000 से 1 लाख रुपये तक ली जाती है।
छात्र समझते हैं कि उन्हें व्यक्तिगत ट्रेनिंग मिल रही है, जबकि हकीकत में वे एक डिजिटल लाइब्रेरी खरीद रहे होते हैं।
टॉपर्स और रिव्यू का खेल
सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले:
- “सक्सेस स्टोरी वीडियो”
- “एक्स-स्टूडेंट रिव्यू”
- “पहले पैकेज, बाद में कोर्स” जैसे इंटरव्यू
अक्सर चुने हुए या प्रायोजित होते हैं। हज़ारों असफल छात्रों की कहानियाँ विज्ञापन में कभी नहीं दिखतीं।
EMI और फाइनेंस का नया जाल
ऑनलाइन कोर्स इंडस्ट्री का नया हथियार है—EMI पर कोर्स। छात्र बिना पूरी जानकारी के लोन एग्रीमेंट साइन कर देता है।
बाद में:
- कोर्स छोड़ने पर भी EMI चलती रहती है
- रिफंड लगभग नामुमकिन
- क्रेडिट स्कोर तक प्रभावित हो जाता है
यह शिक्षा से ज़्यादा फाइनेंस प्रोडक्ट बन चुका है।
असंगठित और ग्रामीण युवाओं पर सबसे बड़ा असर
छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के युवा:
- डिग्री के बावजूद बेरोज़गार हैं
- निजी ट्रेनिंग पर निर्भर हैं
- डिजिटल नियमों और शर्तों से अनजान हैं
यही वर्ग ऑनलाइन कोर्स मार्केटिंग का सबसे आसान शिकार बनता है।
कानून और निगरानी की कमी
भारत में:
- ऑनलाइन कोर्स प्लेटफॉर्म के लिए स्पष्ट रेगुलेटरी फ्रेमवर्क नहीं
- विज्ञापन दावों की प्रभावी जांच नहीं
- छात्रों के लिए तेज़ और सरल शिकायत प्रणाली नहीं
जब तक शिक्षा और कौशल को अलग-अलग व्यापार की तरह नहीं देखा जाएगा, तब तक यह भ्रम बना रहेगा।
समाधान क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि:
- जॉब गारंटी जैसे शब्दों पर सख्त नियंत्रण हो
- कोर्स की वास्तविक उपयोगिता सार्वजनिक रूप से बताई जाए
- रिफंड और EMI नियम पारदर्शी हों
- छात्र विज्ञापन नहीं, कंटेंट और ट्रेनर देखकर फैसला लें
ऑनलाइन शिक्षा बुरी नहीं है, लेकिन अधूरी सच्चाई खतरनाक ज़रूर है।
निष्कर्ष
ऑनलाइन कोर्स ज्ञान का माध्यम हो सकता है, लेकिन जब उसे सपनों की बिक्री बना दिया जाए, तो शिक्षा नहीं, निराशा पैदा होती है।
सबसे बड़ा झूठ यही है कि सिर्फ कोर्स आपको नौकरी दिला देगा। असल सफलता अब भी सीखने की गहराई, अभ्यास और अवसर पर निर्भर करती है।